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प्रवासी हिंदी का...

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प्रवासी हिंदी का...

प्रवासी हिंदी काव्य (अमेरिका) में प्रवासी भारतीयों का यथार्थ

Author Name : डॉ. प्रियंका

जब तक व्यक्ति अपने देश में होता है तो वह स्वदेशी कहलाता है । अर्थात  भारत में है तो भारतीय कहलाएगा परन्तु यदि वह अन्थोपार्जन हेतु विदेश में रहने लगे, उस परिस्थिति में प्रवासी भारतीयों का नाम उसको मिल जाता है ।  भले ही उसको विदेश में  स्थायित्व  के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र मिल जाए ।  भारत की सांस्कृतिक विरासत जो की जीवन मूल्यों पर आधारित है, उसको त्याग भारतीय व्यक्ति एक अपरिचित स्थान पर जाकर जीवन यापन करता है और एकांकी वहाँ की बेखबर दुनिया का हिस्सा बन जाता है ।  शायद इसलिए डॉ अंजना जी अपनी कविता में लिखती है कि प्रवासी भारतीय जीवित होते हुए भी मृत के समान है और भारतीय मरकर भी जीवित रहता है ।  इससे ज्ञात होता है कि वास्तव में व्यक्ति कि पहचान वही होती है जहाँ वह जन्म लेता है ।  अमेरिका का यथार्थ मीठा और कड़वा दोनों ही स्वाद से परिपूर्ण है ।  वहाँ कि मनोहारी स्वच्छता जहा एक और आह्लादित  करने वाली है वही दूसरी ओर भारतीयों को चौकाने वाली भी है ।