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इक्कीसवीं सदी की ...

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इक्कीसवीं सदी की ...

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविताओं में पर्यावरणीय चेतना

Author Name : निधि श्रीवास्तव, डॉ. गायत्री बाजपेयी

साहित्य सामाजिक यथार्थ का प्रतिबिंब होता है, प्रत्येक देशकाल के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन हो जाता है। साहित्य मानव जीवन की व्याख्या करने का एक सर्वोत्तम साधन है।

 

साहित्य की विधाओं में कविता वह विधा है जिसमें हमारे मनोभावों को कलात्मक ढंग से किसी भाषा के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। भारत में कविता का इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है, पर्यावरणीय चेतना भारतीय संस्कृति की प्राचीन धरोहर है । वस्तुत: 21वीं सदी की हिंदी कविता में पर्यावरणीय चेतना विशेष प्रवृत्ति से युक्त होकर आगे बड़ी है। यह कविता कालबोध की  मांग की पूर्ति करती है। इसके प्रादुर्भाव के पीछे मानवतावादी दृष्टिकोण विद्यमान है। पर्यावरण हमारे जीवन से प्रत्यक्ष जुड़ा हुआ विषय है ।हम किसी प्रकार से भी इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते हैं।

                   

हिंदी साहित्य में पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं में प्रकृति के सौंदर्य चित्रण व मानवीकरण से लेकर पर्यावरण प्रदूषण, ग्लोबलाइजेशन व अन्य महत्वपूर्ण समस्याओं पर चिंतन किया गया है। मनुष्य का संपूर्ण अस्तित्व प्रकृति से ही जुड़ा है, वह अपने जीवन तथा सभी समस्याओं की पूर्ति हेतु प्रकृति पर निर्भर है। हिंदी कवियों व साहित्यकारों ने अपने अधिकांश काव्य व साहित्य में प्रकृति के महत्व को दर्शाते हुए पर्यावरण के गूढ़ रहस्यो व तथ्यों को उद्घाटित कर पर्यावरण संरक्षण के प्रति जन जागृति  लाने की पूर्ण चेष्टा की है–