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भारवि के महाकाव्य किरातार्जुनीयम् का समीक्षात्मक अध्ययन
Author Name : मधुबाला मीना
शोध सारांश
अपने विपुल भाषिक एवं ऐतिहासिक महत्व के बावजूद यह ग्रंथ साधारण जन के लिए विलुप्तप्राय हो चुका है. विश्वविद्यालयों में लगे कुछ अंशों को छोड़कर सम्यक् टीका और अनुवाद के साथ पूरे ग्रंथ का मिलना तक दुस्तर है । इसकी अनूठी विशेषताओं के मूल्यांकन के साथ समग्र कृति का एक संक्षिप्त पाठ सँजोऐं लेने का यह विनम्र प्रयास इसी परिप्रेक्ष्य में किया गया है । संस्कृत के छः प्रसिद्ध महाकाव्य हैं, जिन्हें एक परम्परा के तहत बृहत् और लघु दो श्रेणियों में रखा गया हैदृ तीन बृहत्त्रयी और तीन लघुत्रयी. किरातार्जनुयीयम् (भारवि), शिशुपालवधम् (माघ) और नैषधीयचरितम् (श्रीहर्ष)दृबृहत्त्रयी. कुमारसंभवम्, रघुवंशम् और मेघदूतम्दृतीनों कालिदास केकृलघुत्रयी. मेघदूतम् कलेवर में छोटा होने तथा महाकाव्य के काव्यशास्त्रीय गुणोंदृ आचार्य दण्डी के ‘काव्यादर्श’ के अनुसार सर्ग-निबद्धता; ‘ऐतिहासिक’ या पौराणिक कथा; धर्म, अर्थ, काम मोक्ष के चारों पुरुषार्थों का विपाक; कुशल, उदात्त नायक; नगर, उपवन, समुद्र, पर्वत, ऋतुओं तथा जीवन के समग्र का वर्णनदृसे वंचित होने के बावजूद, इस वर्गीकरण में महाकाव्य कैसे मान लिया गया, स्पष्ट नहीं होता. प्रकृतितः तो यह खंडकाव्य है । किरातार्जुनीयम् भारवि की एकमात्र उपलब्ध कृति है, जिसने एक सांगोपांग महाकाव्य का मार्ग प्रशस्त किया. माघ-जैसे कवियों ने उसी का अनुगमन करते हुए संस्कृत साहित्य भंडार को इस विधा से समृद्ध किया और इसे नई ऊँचाई प्रदान की । प्रस्तुत शोध पत्र में भारवि के महाकाव्य किरातार्जुनीयम् का समीक्षात्मक अध्ययन किया गया है ।
मुख्य बिन्दु:- ‘उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्.’ , किरातार्जुनीयम् विविध सर्ग , भारवि का चित्रकाव्य , छंद एवं निष्कर्ष ।