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सांस्कृतिक चेतना का उत्कर्ष: तुलसी कृत पार्वती-मंगल

Author Name : प्रो॰ संजीव कुमार

शोध-पत्र-सार

‘पार्वती-मंगल’ सांस्कृतिक चेतना के उत्कर्ष का काव्य है जिसके माध्यम से महान् कवि गोस्वामी तुलसीदास ने आचार, विचार और संस्कार के परिष्कार की व्यवस्थित योजना प्रस्तुत की है। हिमाचल और मैना के रूप में जहाँ माँ-बाप की बेटी को लेकर की गयी चिन्ताओं का हृदयस्पर्शी मार्मिक वर्णन है, वहीं पार्वती के माध्यम से काव्यकार ने नारी-शक्ति, नारी की मानसिक-शारीरिक दृढ़ता, संकल्पशीलता और मर्यादित आचरण का प्रभावशाली चित्रण किया है। नारी, शक्ति का अजस्र स्रोत है। वह अपनी अन्तर्निहित शक्ति से बड़े से बड़े लक्ष्य को अधिगत कर सकती है। अभीष्ट को पाकर भी नारी संयमित, मर्यादित और अनुशासित रहती है। शिव-पार्वती विवाह के माध्यम से उत्साह, उल्लास, हर्ष और आनन्द का वातावरण तो चहुँ ओर व्याप्त रहता ही है, साथ-साथ रस्मों-रिवाज़ों के माध्यम से भारतीय चिन्तन की पराकाष्ठा, सार्थकता और उपयोगिता भी साकार हुई है। काव्य में साहस, दृढ़ निश्चय, एकनिष्ठ भाव से की गयी भक्ति की महत्ता, लक्ष्य प्राप्ति के लिए निष्ठा आदि मूल्यों की प्रतिष्ठा भी गयी है। विकार का कारण रहते हुए भी काम को वश में करने वाले को ही सच्चा धीर बतलाया गया है। श्रेष्ठ साधन भी किसी कार्य की सिद्धि में तभी सहायक होते हैं जब मन में साहस हो।